Suchana Lekhan Notice Writing

सूचना लेखन (Notice Writing) की परिभाषा सूचना मौखिक या लिखित रूप में दी जाती है। आधुनिक युग में मौखिक सूचना आकाशवाणी, रेडियो, टेलीविजन आदि के माध्यम से दी जाती है। जब सूचना लिखित रूप में देने के लिए तैयार की जाती है, तो उसे ‘सूचना लेखन’ कहते हैं। दूसरे शब्दों में- कम से कम शब्दों में […]

Vakya Visletion ||वाक्य विश्लेषण||

परिभाषा – वाक्य में प्रयुक्त पदों को अलग-अलग कर उनका पारस्परिक संबंध बतलाना ही वाक्य-विश्लेषण कहलाता है। वाक्य विश्लेषण में पहले उद्देश्य एवं विधेय को छाँट लिया जाता है। उसके बाद उनके विस्तार का अलग-अलग उल्लेख किया जाता है। 1. सरल वाक्य का विश्लेषण सरल वाक्य का विश्लेषण करते समय हमें निम्नलिखित बातों पर ध्यान […]

Vaky Parivartan ||वाक्य-परिवर्तन||

वाक्य-परिवर्तन (Vaky Parivartan) की परिभाषा बिना अर्थ बदले किसी वाक्य को दूसरे प्रकार के वाक्य में परिवर्तित करना वाक्य-परिवर्तन कहलाता हैं। यहाँ वाक्य-परिवर्तन के कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं- सरल वाक्य से मिश्र वाक्य सरल वाक्य- मेहनत करनेवाले हमेशा सफल होते हैं।मिश्र वाक्य- जो मेहनत करते हैं, वे हमेशा सफल होते हैं।सरल वाक्य- उसके […]

Kavya prayojan ||काव्य-प्रयोजन||

‘काव्य प्रयोजन का तात्पर्य है ‘काव्य रचना का उद्देश्य’। वस्तुतः कावय प्रयोजन काव्य प्ररेणा से अलग है क्योंकि कावय प्रेरणा का अभिप्राय है। कावय की रचना के लिए प्रेरित करने वाले तत्व जबकि काव्य प्रयोजन का अभिप्राय है काव्य रचना के अनन्तर प्राप्त होने वाले लाभ। आचार्यों ने निम्नलिखित काव्य प्रयोजन बताए है- आचार्य काव्य […]

kavy Hetu ||काव्य-हेतु||

काव्य-हेतु (kavy Hetu) ‘हेतु’ शब्द का अर्थ है ”हेतुर्ना कारण” अर्थात हेतु कारण को कहते हैं। अतः ‘काव्य-हेतु’ का अर्थ है- ‘काव्य के उत्पत्ति का कारण’। किसी व्यक्ति में काव्य रचना की सामर्थ्य उत्पन्न कर देने वाले कारण ‘काव्य हेतु कहलाते हैं। बाबू गुलाब राय के शब्दों में, ”हेतु का अभिप्राय उन साधनों से है […]

Kavya lakshan-||काव्य लक्षण||

Kavya lakshan (काव्य लक्षण) संस्कृत में काव्य लक्षण आचार्यों ने मुख्यतः तीन, आधारों पर किया है जो निम्न है- (1) शब्द और अर्थ के आधार पर (2) शब्द के आधार पर और (3) रस और ध्वनि के आधार पर। (1) शब्दार्थ के आधार पर आचार्य काव्य लक्षण भामह शब्दार्थौ सहितौ काव्यम् रुद्रट ननु शब्दार्थौ काव्यम्। […]

Kavya Sastra||पाश्चात्य काव्यशास्त्र||

पाश्चात्य काव्यशास्त्र पाश्चात्य काव्य चिन्तन की परम्परा का विकास 5वीं सदी ईस्वी पूर्व से माना जाता है।पाश्चात्य काव्य चिन्तन की परम्परा में 5वीं सदी ईस्वी के पूर्व हेसियड, सोलन, पिंडार, नाटककार एरिस्तोफेनिस आदि की रचनाओं में साहित्यिक सिद्धान्तों का उल्लेख मिलता है।एक व्यवस्थित शास्त्र के रूप में पाश्चात्य साहित्यालोचन की पहली झलक प्लेटो (427-347 ई० […]

Kavyashastra(Poetic||काव्यशास्त्र||

काव्यशास्त्र (Poetic) भारतीय काव्यशास्त्र संस्कृत आलोचना के प्रमुख आचार्य (1) भरतमुनि भरत मुनि को संस्कृत काव्यशास्त्र का प्रथम आचार्य माना जाता है।आचार्य बलदेव उपाध्याय ने इनका समय द्वितीय शती माना है।भरतमुनि की प्रसिद्ध रचना ‘नाट्यशास्त्र’ है जिसमें नाटक के सभी पक्षों का विस्तृत विवेचन किया गया है।आचार्य भरत ने ‘नाट्यशास्त्र’ को ‘पंचमवेद’ भी कहा है।’नाट्यशास्त्र’ […]

Unarathak Shbad ||ऊनार्थक शब्द||

ऊनार्थक शब्द (Unarathak Shbad) की परिभाषा जिस शब्द से न्यूनता, तुच्छता या संक्षिप्ता का बोध होता है, उसे ऊनार्थक शब्द कहते हैं। इनका प्रयोग निम्नलिखित अवस्थाओं में होता है :(क) किसी वस्तु का छोटा रूप दिखाने के लिए।(ख) प्यार या स्नेह का भाव सूचित करने के लिए।(ग) किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति अनादर का […]

Nipat (Particle)-||निपात||

निपात (Particle) की परिभाषा किसी भी बात पर अतिरिक्त भार देने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है उसे निपात कहते है।जैसे- तक, मत, क्या, हाँ, भी, केवल, जी, नहीं, न, काश। उदाहरण- तुम्हें आज रात रुकना ही पड़ेगा।तुमने तो हद कर दी।कल मै भी आपके साथ चलूँगा।गांधीजी को बच्चे तक जानते है।धन कमा लेने मात्र से जीवन सफल नहीं हो जाता।नीरव खाने के […]