Karak (Case)||कारक||

February 20, 2021

कारक (Case) की परिभाषा

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ उनका (संज्ञा या सर्वनाम का) सम्बन्ध सूचित हो, उसे (उस रूप को) ‘कारक’ कहते हैं।
अथवा- संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से उनका (संज्ञा या सर्वनाम का) क्रिया से सम्बन्ध सूचित हो, उसे (उस रूप को) ‘कारक’ कहते हैं।

इन दो ‘परिभाषाओं’ का अर्थ यह हुआ कि संज्ञा या सर्वनाम के आगे जब ‘ने’, ‘को’, ‘से’ आदि विभक्तियाँ लगती हैं, तब उनका रूप ही ‘कारक’ कहलाता हैं।

तभी वे वाक्य के अन्य शब्दों से सम्बन्ध रखने योग्य ‘पद’ होते है और ‘पद’ की अवस्था में ही वे वाक्य के दूसरे शब्दों से या क्रिया से कोई लगाव रख पाते हैं। ‘ने’, ‘को’, ‘से’ आदि विभित्र विभक्तियाँ विभित्र कारकों की है। इनके लगने पर ही कोई शब्द ‘कारकपद’ बन पाता है और वाक्य में आने योग्य होता है। ‘कारकपद’ या ‘क्रियापद’ बने बिना कोई शब्द वाक्य में बैठने योग्य नहीं होता।

दूसरे शब्दों में- संज्ञा अथवा सर्वनाम को क्रिया से जोड़ने वाले चिह्न अथवा परसर्ग ही कारक कहलाते हैं।

जैसे- ”रामचन्द्रजी ने खारे जल के समुद्र पर बन्दरों से पुल बँधवा दिया।”
इस वाक्य में ‘रामचन्द्रजी ने’, ‘समुद्र पर’, ‘बन्दरों से’ और ‘पुल’ संज्ञाओं के रूपान्तर है, जिनके द्वारा इन संज्ञाओं का सम्बन्ध ‘बँधवा दिया’ क्रिया के साथ सूचित होता है।

दूसरा उदाहरण-
श्रीराम ने रावण को बाण से मारा
इस वाक्य में प्रत्येक शब्द एक-दूसरे से बँधा है और प्रत्येक शब्द का सम्बन्ध किसी न किसी रूप में क्रिया के साथ है।

यहाँ ‘ने’ ‘को’ ‘से’ शब्दों ने वाक्य में आये अनेक शब्दों का सम्बन्ध क्रिया से जोड़ दिया है। यदि ये शब्द न हो तो शब्दों का क्रिया के साथ तथा आपस में कोई सम्बन्ध नहीं होगा। संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया के साथ सम्बन्ध स्थापित करने वाला रूप कारक होता है।

कारक के भेद-

हिन्दी में कारको की संख्या आठ है-
(1)कर्ता कारक (Nominative case)
(2)कर्म कारक (Accusative case)
(3)करण कारक (Instrument case)
(4)सम्प्रदान कारक(Dative case)
(5)अपादान कारक(Ablative case)
(6)सम्बन्ध कारक (Gentive case)
(7)अधिकरण कारक (Locative case)
(8)संबोधन कारक(Vocative case)

कारक के विभक्ति चिन्ह

कारकों की पहचान के चिह्न व लक्षण निम्न प्रकार हैं-

कारकलक्षणचिह्नकारक-चिह्न या विभक्तियाँ
(1)कर्ताजो काम करेंनेप्रथमा
(2)कर्मजिस पर क्रिया का फल पड़ेकोद्वितीया
(3)करणकाम करने (क्रिया) का साधनसे, के द्वारातृतीया
(4)सम्प्रदानजिसके लिए किया की जाएको,के लिएचतुर्थी
(5)अपादानजिससे कोई वस्तु अलग होसे (अलग के अर्थ में)पंचमी
(6) सम्बन्धजो एक शब्द का दूसरे से सम्बन्ध जोड़ेका, की, के, रा, री, रेषष्ठी
(7)अधिकरणजो क्रिया का आधार होमें,परसप्तमी
(8) सम्बोधनजिससे किसी को पुकारा जायेहे! अरे! हो!सम्बोधन

विभक्तियाँ- सभी कारकों की स्पष्टता के लिए संज्ञा या सर्वनाम के आगे जो प्रत्यय लगाये जाते हैं, उन्हें व्याकरण में ‘विभक्तियाँ’ अथवा ‘परसर्ग’ कहते हैं।
विभक्ति से बने शब्द-रूप को ‘पद’ कहते हैं। शब्द (संज्ञा और क्रिया) बिना पद बने वाक्य में नहीं चल सकते। ऊपर सभी कारकों के विभक्त-चिह्न दे दिये गये हैं।

विभक्तियों की प्रायोगिक विशेषताएँ

प्रयोग की दृष्टि से हिन्दी कारक की विभक्तियों की कुछ अपनी विशेषताएँ हैं। इनका व्यवहार करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

(i) सामान्यतः विभक्तियाँ स्वतन्त्र हैं। इनका अस्तित्व स्वतन्त्र है। चूँकि एक काम शब्दों का सम्बन्ध दिखाना है, इसलिए इनका अर्थ नहीं होता। जैसे- ने, से आदि।

(ii) हिन्दी की विभक्तियाँ विशेष रूप से सर्वनामों के साथ प्रयुक्त होने पर प्रायः विकार उत्पत्र कर उनसे मिल जाती हैं। जैसे- मेरा, हमारा, उसे, उन्हें।

(iii) विभक्तियाँ प्रायः संज्ञाओं या सर्वनामों के साथ आती है। जैसे- मोहन की दुकान से यह चीज आयी है।


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