Lekhan kla (Penmanship) ||लेखन-कला||

February 21, 2021

लेखन-कला (Penmanship) की परिभाषा

प्रत्येक व्यक्ति दूसरों पर अपने मन के भावों को प्रकट करने के लिए वाक्य बोलता है। जो व्यक्ति बोलने की कला भली-भाँति जानता है, उसके वाक्यों का दूसरों पर अधिक प्रभाव पड़ता है। बोलने का उत्कृष्ट रूप भाषण या व्याख्यान होता है। इसके लिए अध्ययन और मनन तथा अभ्यास की आवश्यकता होती है। लिखना बोलने से अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। बहुत सारे व्यक्ति अच्छा बोल तो लेते हैं; लेकिन अच्छा लिख नहीं पाते। कुछ में दोनों योग्यताएँ होती हैं। लिखने में विशेष कुशलता हासिल करने के लिए अध्ययन, निरीक्षण, भ्रमण, मनन तथा अभ्यास की महती आवश्यकता होती है।

लेखन कला के मूलतः बारह गुण होते हैं-
(1) शुद्धता:- सुन्दर लेख के लिए पहली शर्त है- शुद्धता। हमें न सिर्फ वर्तनी की शुद्धता, बल्कि वाक्यों की शुद्धता पर भी ध्यान देना चाहिए। यदि उच्चारण करते समय ही ह्रस्व-दीर्ध, संयुक्त-असंयुक्त, शिरोरेखा, मात्रा आदि का ध्यान रखा जाय तो लिखने और बोलने में काफी सुगमता होती है।
हमें स्त्रीलिंग-पुंल्लिंग, वचन, कारक-चिह्नों एवं विराम-चिह्नों को ध्यान में रखते हुए लिखना चाहिए। हमें कर्त्ता, कर्म एवं क्रिया के क्रम पर विशेष ध्यान देना चाहिए, साथ ही हर संज्ञा के लिए उपयुक्त विशेषण और क्रिया के लिए क्रियाविशेषण का प्रयोग करने से वाक्य प्रभावोत्पादक होता है।
मुहावरों एवं लोकोक्तियों का प्रयोग उचित स्थानों पर ही करना चाहिए, यत्र-तत्र नहीं। लम्बे वाक्यों में कर्त्ता एवं क्रिया का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

(2) सुलेख:- प्रतिदिन के व्यवहार और परीक्षा में विशेषतः सुलेख का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। लेख को देखते ही पाठक या परीक्षक के मन में लेखक या परीक्षार्थी के प्रति प्रतिकूल अथवा अनुकूल भाव उत्पन्न हो जाता है। अतएव, आपका लेख सुन्दर, सुस्पष्ट और सुपाठ्य होना चाहिए। सुलेख अभ्यास से बनता है। इसके लिए निम्नलिखित बातों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
(i) कभी भी अतिशीघ्रता न करें।
(ii) हाथ को ढीला न रखें, कलम अथवा पेंसिल को सही रूप से पकड़ें।
(iii) सभी अक्षरों के वास्तविक स्वरूप को ही लिखें। जैसे- ‘उ’ और ‘ड’ में ‘रा’ और ‘ए’, ‘ख’ और ‘रव’ में, ‘क’ और ‘फ’ में ‘क्ष’ और ‘झ’ में, ‘द्य’ और ‘घ’ में, ‘घ’ और ‘ध’ में फर्क समझे।
(iv) अपनी सुविधानुसार अक्षरों में एकरूपता लायें। यानी यदि आपके अक्षर बायीं ओर झुकते हैं तो सभी अक्षर बायीं ओर ही हों। कुछ बायीं, कुछ दायीं, कुछ सीधे लिखने से लिखावट भद्दी होती है।
(v) खुरदरे और स्याही फैलनेवाले कागज पर मत लिखें।

(3) मौलिकता:- ‘मौलिकता’ का अर्थ है- आपकी अपनी चीज या सोच। किसी के भावों की कल्पनाओं की या शैली की पूरी नकल नहीं करनी चाहिए। आपकी रचनाओं में नवीनता, अपनापन, अपनी शैली और अपनी छाप जरूर हो। मौलिक रचना लिखने के लिए सतत अध्ययन, मनन, चिन्तन और अभ्यास की जरूरत पड़ती है।

(4) सरलता:- सरलता किसी लेख का विशेष गुण है। भाषा के कठिन होने और शैली के बोझिल होने से भाव की स्पष्टता जाती रहती है। प्रयास यह होना चाहिए कि आपकी भाषा अत्यन्त सरल, बोधगम्य और रोचक हो। कठिन शब्दों के प्रयोग से अशुद्धियों की ज्यादा संभावना होती है और भाषा भी बनावटी हो जाती है। एक प्रोफेसर ने एक सामान्य घटना का जिक्र इस प्रकार किया-
”श्रीमन्त, मेरे द्विचक्र का अग्रचक्र दुश्चक्र में पड़कर वक्र हो गया।” अर्थात महाशय, मेरी साइकिल का अगला पहिया खड्ड में पड़ने के कारण टेढ़ा हो गया। आप स्वयं कल्पना करें उपर्युक्त वाक्य कितना अस्पष्ट है और बात कितनी सरल-सी है। हमें इस तरह की रचनाओं से बचना चाहिए। इसी अस्पष्टता के कारण संस्कृत जो कभी जन-जन की भषा थी वह आम जनता से कटती चली गई और आज मरणासन्न स्थिति को प्राप्त हुई है।


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