Pllvan (Amplification) ||पल्लवन||

February 20, 2021

Pllvan (Amplification) पल्लवन


पल्लवन (Amplification) की परिभाषा

किसी सुगठित एवं गुम्फित विचार अथवा भाव के विस्तार को ‘पल्लवन’ कहते है।

अनुभूति अथवा चिंतन के क्षणों में जब विचार उठते हैं, तब उनमें सूत्रात्मकता आ आती है। सरसरी दृष्टि से पढ़ने पर उसका सामान्य अर्थ-बोध भले हो जाए, किंतु सम्यक् अर्थ-बोध एवं अर्थ-विस्तार के लिए गहराई में उतरना पड़ता है। ज्यों-ज्यों हम उस गंभीर घाव करनेवाले नाविक के तीर जैसे वाक्य-खंड, वाक्य या वाक्य-समूह में डूबते हैं, त्यों-त्यों हम उसका मर्म समझने लगते हैं; गागर में सागर का रहस्य समझने लगते हैं।

संसार के जितने महान विचारक, चिंतक एवं लेखक हैं उनके वाक्य चिंतन के शिलीभूत शब्द-समूह होते हैं। बेकन, इमरसन, कार्लाइल, पं. रामचंद्र शुक्ल की उक्तियाँ सैक्रीन या होमियोपैथिक गोलियों की तरह रस-भरी तथा उच्च क्षमतावाली होती हैं।

अतः पल्लवन और कुछ नहीं, वरन् बीज से वृक्ष, बिंदु से वृत्त, कली से फूल अथवा लौ से आलोक-परिधि बना देने की सहज प्रक्रिया है। छोटे-से वाक्य या वाक्य खंड में जो विचार बंद पड़े हैं, उन्हें खोल देना, फैला देना, प्रसृत-विस्तृत कर देना है। छोटा सूत्रात्मक वाक्य फैलाकर एक लघु निबंध का रूप धारण कर लेता है।

हिन्दी में इसके लिए विस्तारण, वृद्धिकरण तथा अँग्रेजी में Amplification शब्द चलते हैं। पल्लवन संक्षेपण का ठीक विलोम है, क्योंकि संक्षेपण में संकोचन आवश्यक हैं, तो पल्लवन में विस्तार अपेक्षित है।

कम-से-कम शब्दों अथवा एक वाक्य में कहे अथवा लिखे गये भावों और विचारों में इतनी स्पष्टता नहीं रहती कि हर तरह के लोग उन्हें आसानी से समझ सकें। एक सधे लेखक का बड़ा गुण यह है कि वह कम-से-कम शब्दों में अधिक-से-अधिक बातें लिखता है। अँगरेजी में बेकन (Bacon) और हिन्दी में पण्डित रामचन्द्र शुक्ल ऐसे ही गद्यलेखक थे। कविता में तो इस प्रकार के लेखक की गुंजाइश अधिक है। किन्तु, जब ‘गागर में सागर’-जैसी चेष्टा की जाती है, तब उसमें साधारण लोगों के लिए अर्थ की स्पष्टता नहीं रह जाती। ऐसी स्थिति में विचार अथवा भाव के तार-तार को अलग कर ‘तारतम्य’ के साथ समझने के लिए एक कुशल व्याख्याता की आवश्यकता पड़ती है।

इतना ही नहीं, हिन्दी में ऐसी हजारों सूक्तियाँ और कहावतें प्रचलित है, जिनके अर्थ ऊपर से तो स्पष्ट नहीं है, किन्तु उनका अर्थ-विस्तार करने पर उनके भाव पूरी तरह स्पष्ट हो जाते है। लेखन की इस क्रिया को हिन्दी में ‘पल्लवन’ कहते है। इसे हम अँगरेजी शब्दावली में ‘Miniature essay’ और हिन्दी में ‘लघु निबन्ध’ कह सकते है। इसमें मूल वाक्य में आये विचारसूत्रों को सही-सही अर्थ में पकड़ने की चेष्टा की जाती है। यहाँ यह देखा जाता है कि छात्र या व्याख्याता ने किसी गम्भीर तथ्य को कितनी बारीकी से और गहराई में उतरकर समझा है और अपनी भाषा में वह उसे कितनी दूर तक सुस्पष्ट कर सका है।


Shivek Sir gk